ग्रंथश्रीरामचरितमानसबालकाण्डदोहा 185185.3श्रीरामचरितमानस 185.3धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरिपद सुमिरु। जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति ॥184॥पिछलापूरा अध्याय