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श्रीरामचरितमानस 179.2

खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव ॥178(क)॥

पूरा अध्याय