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श्रीरामचरितमानस 16.2

सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ ॥15॥

पूरा अध्याय