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श्रीरामचरितमानस 150.2

दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।।
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ ॥149॥

पूरा अध्याय