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श्रीरामचरितमानस 122.2

असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु ॥121॥

पूरा अध्याय