ग्रंथश्रीरामचरितमानसबालकाण्डदोहा 118118.2श्रीरामचरितमानस 118.2रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर बारि। जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि ॥117॥पिछलापूरा अध्याय