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महाभारत 67.22

ब्रुवन्किरीटी तमतिप्रहृष्टो; अयं शरो मे विजयावहोऽस्तु
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभावः; कर्णं समाप्तिं नयतां यमाय

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