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महाभारत 66.28

ततो वृषो बाणनिपातकोपितो; महोरगो दण्डविघट्टितो यथा
तथाशुकारी व्यसृजच्छरोत्तमा;न्महाविषः सर्प इवोत्तमं विषम्

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