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महाभारत 66.24

ततस्तु जिष्णुः परिहृत्य शेषां;श्चिच्छेद षड्भिर्निशितैः सुधारैः
नागं वियत्तिर्यगिवोत्पतन्तं; स छिन्नगात्रो निपपात भूमौ

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