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महाभारत 65.2

यथा गजौ हैमवतौ प्रभिन्नौ; प्रगृह्य दन्ताविव वाशितार्थे
तथा समाजग्मतुरुग्रवेगौ; धनंजयश्चाधिरथिश्च वीरौ

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