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महाभारत 49.87

त्वं देविता त्वत्कृते राज्यनाश;स्त्वत्संभवं व्यसनं नो नरेन्द्र
मास्मान्क्रूरैर्वाक्प्रतोदैस्तुद त्वं; भूयो राजन्कोपयन्नल्पभाग्यान्

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