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महाभारत 42.19

अभ्यभाषत संक्रुद्धो द्रौणिर्दूरे धनंजये
तिष्ठ तिष्ठाद्य ब्रह्मघ्न न मे जीवन्विमोक्ष्यसे

पूरा अध्याय