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महाभारत 4.97

तथा सुतस्ते ज्वलनार्कवर्णं; रथं समास्थाय कुरुप्रवीर
व्यवस्थितः कुरुमित्रो नरेन्द्र; व्यभ्रे सूर्यो भ्राजमानो यथा वै

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