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महाभारत 21.10

तमपि सरथवाजिसारथिं; शिनिवृषभो विविधैः शरैस्त्वरन्
भुजगविषसमप्रभै रणे; पुरुषवरं समवास्तृणोत्तदा

पूरा अध्याय