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महाभारत 63.33

बहुरथमनुजाश्वपत्तिनागं; प्रतिभयनिस्वनमद्भुताभरूपम्
अहितहृदयभेदनं महद्वै; शकटमवेक्ष्य कृतं ननन्द राजा

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