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महाभारत 51.42

स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना; भृशं सुपूर्णोदरनिःसृतध्वनिः
जगत्सपातालवियद्दिगीश्वरं; प्रकम्पयामास युगात्यये यथा

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