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महाभारत 154.60

ततोऽन्तरिक्षादपतद्गतासुः; स राक्षसेन्द्रो भुवि भिन्नदेहः
अवाक्शिराः स्तब्धगात्रो विजिह्वो; घटोत्कचो महदास्थाय रूपम्

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