ग्रंथमहाभारतद्रोणपर्वअध्याय 145145.63महाभारत 145.63देवानामिव देवेन्द्रे जयाशा मे त्वयि स्थिता जहि मातुल कौन्तेयानसुरानिव पावकिःपिछलाअगलापूरा अध्याय