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महाभारत 143.17

रुक्मपुङ्खैरजिह्माग्रैः शरैश्छिन्नतनुच्छदौ
रुधिरौघपरिक्लिन्नौ व्यभ्राजेतां महामृधे

पूरा अध्याय