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महाभारत 127.12

कर्ण उवाच
आचार्यं मा विगर्हस्व शक्त्या युध्यत्यसौ द्विजः
अजय्यान्पाण्डवान्मन्ये द्रोणेनास्त्रविदा मृधे

पूरा अध्याय