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महाभारत 123.8

कर्ण कर्ण वृथादृष्टे सूतपुत्रात्मसंस्तुत
अधर्मबुद्धे शृणु मे यत्त्वा वक्ष्यामि सांप्रतम्

पूरा अध्याय