ग्रंथमहाभारतद्रोणपर्वअध्याय 122122.57महाभारत 122.57स शैनेयं रणे क्रुद्धः प्रदहन्निव चक्षुषा अभ्यद्रवत वेगेन पुनः पुनररिंदमःपिछलाअगलापूरा अध्याय