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महाभारत 115.24

निवार्य तांस्तूर्णममित्रघाती; नप्ता शिनेः पत्रिभिरग्निकल्पैः
दुःशासनस्यापि जघान वाहा;नुद्यम्य बाणासनमाजमीढ

पूरा अध्याय