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महाभारत 55.94

एह्येहि देवेश जगन्निवास; नमोऽस्तु ते शार्ङ्गरथाङ्गपाणे
प्रसह्य मां पातय लोकनाथ; रथोत्तमाद्भूतशरण्य संख्ये

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