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महाभारत 55.124

नराश्वनागास्थिनिकृत्तशर्करा; विनाशपातालवती भयावहा
तां कङ्कमालावृतगृध्रकह्वैः; क्रव्यादसंघैश्च तरक्षुभिश्च

पूरा अध्याय