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महाभारत 24.5

गुरूनहत्वा हि महानुभावा;ञ्श्रेयो भोक्तुं भैक्षमपीह लोके
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव; भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान्

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