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महाभारत 81.6

वैशंपायन उवाच
ततो व्यपेते तमसि सूर्ये विमल उद्गते
मैत्रे मुहूर्ते संप्राप्ते मृद्वर्चिषि दिवाकरे

पूरा अध्याय