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महाभारत 38.2

पीठं दत्त्वा साधवेऽभ्यागताय; आनीयापः परिनिर्णिज्य पादौ
सुखं पृष्ट्वा प्रतिवेद्यात्मसंस्थं; ततो दद्यादन्नमवेक्ष्य धीरः

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