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महाभारत 36.21

प्राप्नोति वै वित्तमसद्बलेन; नित्योत्थानात्प्रज्ञया पौरुषेण
न त्वेव सम्यग्लभते प्रशंसां; न वृत्तमाप्नोति महाकुलानाम्

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