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महाभारत 32.16

स त्वमर्थं संशयितं विना तै;राशंससे पुत्रवशानुगोऽद्य
अधर्मशब्दश्च महान्पृथिव्यां; नेदं कर्म त्वत्समं भारताग्र्य

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