ग्रंथमहाभारतउद्योगपर्वअध्याय 180180.23महाभारत 180.23आचार्यता मानिता मे निर्मर्यादे ह्यपि त्वयि भूयस्तु शृणु मे ब्रह्मन्संपदं धर्मसंग्रहेपिछलाअगलापूरा अध्याय