ग्रंथमहाभारतउद्योगपर्वअध्याय 171171.3महाभारत 171.3ततो मूर्धन्युपाघ्राय पर्यश्रुनयना नृप आह सत्यवती हृष्टा दिष्ट्या पुत्र जितं त्वयापिछलाअगलापूरा अध्याय