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महाभारत 17.7

अगस्त्य उवाच
शृणु शक्र प्रियं वाक्यं यथा राजा दुरात्मवान्
स्वर्गाद्भ्रष्टो दुराचारो नहुषो बलदर्पितः

पूरा अध्याय