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महाभारत 146.34

अनुज्ञया चाथ महाव्रतस्य; ब्रूयान्नृपो यद्विदुरस्तथैव
कार्यं भवेत्तत्सुहृद्भिर्नियुज्य; धर्मं पुरस्कृत्य सुदीर्घकालम्

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