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महाभारत 18.1

द्रौपद्युवाच
इदं तु मे महद्दुःखं यत्प्रवक्ष्यामि भारत
न मेऽभ्यसूया कर्तव्या दुःखादेतद्ब्रवीम्यहम्

पूरा अध्याय