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महाभारत 13.7

का देवरूपा हृदयंगमा शुभे; आचक्ष्व मे का च कुतश्च शोभना
चित्तं हि निर्मथ्य करोति मां वशे; न चान्यदत्रौषधमद्य मे मतम्

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