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महाभारत 10.1

वैशंपायन उवाच
अथापरोऽदृश्यत रूपसंपदा; स्त्रीणामलंकारधरो बृहत्पुमान्
प्राकारवप्रे प्रतिमुच्य कुण्डले; दीर्घे च कम्बू परिहाटके शुभे

पूरा अध्याय