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महाभारत 96.4

अगस्त्य उवाच
वित्तार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां पृथिवीपते
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान्संविभागं प्रयच्छ मे

पूरा अध्याय