ग्रंथमहाभारतवनपर्वअध्याय 9595.16महाभारत 95.16असंशयं प्रजाहेतोर्भार्यां पतिरविन्दत या तु त्वयि मम प्रीतिस्तामृषे कर्तुमर्हसिपिछलाअगलापूरा अध्याय