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महाभारत 83.1

पुलस्त्य उवाच
अथ संध्यां समासाद्य संवेद्यं तीर्थमुत्तमम्
उपस्पृश्य नरो विद्वान्भवेन्नास्त्यत्र संशयः

पूरा अध्याय