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महाभारत 38.39

प्रत्युवाच महेन्द्रस्तं प्रीतात्मा प्रहसन्निव
इह प्राप्तस्य किं कार्यमस्त्रैस्तव धनंजय
कामान्वृणीष्व लोकांश्च प्राप्तोऽसि परमां गतिम्

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