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महाभारत 296.31

वैशंपायन उवाच
स त्वमोघानिषून्मुक्त्वा तृष्णयाभिप्रपीडितः
अविज्ञायैव तान्प्रश्नान्पीत्वैव निपपात ह

पूरा अध्याय