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महाभारत 282.1

मार्कण्डेय उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु द्युमत्सेनो महावने
लब्धचक्षुः प्रसन्नात्मा दृष्ट्या सर्वं ददर्श ह

पूरा अध्याय