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महाभारत 281.52

न कामये भर्तृविनाकृता सुखं; न कामये भर्तृविनाकृता दिवम्
न कामये भर्तृविनाकृता श्रियं; न भर्तृहीना व्यवसामि जीवितुम्

पूरा अध्याय