ग्रंथमहाभारतवनपर्वअध्याय 255255.48महाभारत 255.48स प्रविश्याश्रमपदं व्यपविद्धबृसीघटम् मार्कण्डेयादिभिर्विप्रैरनुकीर्णं ददर्श हपिछलाअगलापूरा अध्याय