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महाभारत 253.18

पुरा हि निर्भर्त्सनदण्डमोहिता; प्रमूढचित्ता वदनेन शुष्यता
ददाति कस्मैचिदनर्हते तनुं; वराज्यपूर्णामिव भस्मनि स्रुचम्

पूरा अध्याय