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महाभारत 252.5

नागं प्रभिन्नं गिरिकूटकल्प;मुपत्यकां हैमवतीं चरन्तम्
दण्डीव यूथादपसेधसे त्वं; यो जेतुमाशंससि धर्मराजम्

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