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महाभारत 201.1

मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्तस्तु विप्रेण धर्मव्याधो युधिष्ठिर
प्रत्युवाच यथा विप्रं तच्छृणुष्व नराधिप

पूरा अध्याय