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महाभारत 198.20

धात्रा तु विहितं पूर्वं कर्म स्वं पालयाम्यहम्
प्रयत्नाच्च गुरू वृद्धौ शुश्रूषेऽहं द्विजोत्तम

पूरा अध्याय