ग्रंथमहाभारतवनपर्वअध्याय 190190.75महाभारत 190.75इक्ष्वाकवो हन्त चरामि वः प्रियं; निहन्मीमं विप्रमद्य प्रमथ्य आनीयतामपरस्तिग्मतेजाः; पश्यध्वं मे वीर्यमद्य क्षितीशाःपिछलाअगलापूरा अध्याय